मस्तिष्क की
शांति दशा । यह एकमात्र ऐसी दशा है जिससे कर्म की गुणवत्ता का विकास होता है ।
शांत मस्तिष्क ही वह आदर्श दशा है जिसे प्राप्त करने के लिये समस्त प्रयत्न किये
जाने योग्य प्रयत्न होते हैं । मस्तिष्क में उठने वाले आवेग ही समस्त त्रुटिपूर्ण
कर्मों को जन्म देने वाले होते हैं । कर्म फल प्राप्त करने के आवेग । अनुकूल कर्म
फल ना मिलने की दशा में क्रोध के आवेग । संचित धन के छिन जाने के भय का आवेग । यह
समस्त आवेग मस्तिष्क को अशांत करने वाले होते हैं । अशांत मस्तिष्क की कार्य
गुणवत्ता प्रश्नवाचक होती है । योगावस्था में कार्य करने का अभ्यास पर्याय होता है
शांत मस्तिष्क । सतत अभ्यास प्रदान करता है सतत शांत मस्तिष्क । शांत मस्तिष्क से
किये गये कर्म की गुणवत्ता त्रुटि रहित होगी । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया –
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
मस्तिष्क की ऐसी
दशा जिसमें सुख, दु:ख, लाभ हाँनि, विजय पराजय सभी में वह अविचलित
रहे । शांति का समुंद्र । जिस प्रकार समुंद्र में नदियाँ लगातार जल लाकर गिराती
रहती है परंतु उसका जल स्तर अपरिवर्तित रहता है । उसी प्रकार मस्तिष्क की शांति
दशा समुंद्र के समान होनी चाहिये कि काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता रूपी नदियाँ कितना भी प्रवाह लावें परंतु उसकी
शांति का स्तर अप्रभावित रहे । ऐसे मस्तिष्क के नियंत्रण में किये गये कार्य
त्रुटियों से मुक्त होंगे ।
योग के अभ्यास द्वारा
सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी शांत मस्तिष्क । चिर आनंद की दशा का भोग करना है
तो बनाना होगा मस्तिष्क की शांत दशा । मस्तिष्क की शांत दशा पाने के लिये समस्त
कर्मों को योग की अवस्था में करने का अभ्यास करना ही एकमात्र उपाय है । कर्मों की
कर्ता प्रकृति है । हम प्रकृति के एक सूक्ष्म घटक हैं । प्रकृति द्वारा आदेशित
कर्मों को करना हमारा कर्तव्य है । कार्य के परिणाम से कंचिद मेरा कोई सरोकार नहीं
है । मस्तिष्क में इन सत्यों को धारण कर कार्य करने के अभ्यास द्वारा मिलेगी शांत
मस्तिष्क की दशा ।
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