सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मस्तिष्क की शांति दशा । यह एकमात्र ऐसी दशा है जिससे कर्म की गुणवत्ता का विकास होता है । शांत मस्तिष्क ही वह आदर्श दशा है जिसे प्राप्त करने के लिये समस्त प्रयत्न किये जाने योग्य प्रयत्न होते हैं । मस्तिष्क में उठने वाले आवेग ही समस्त त्रुटिपूर्ण कर्मों को जन्म देने वाले होते हैं । कर्म फल प्राप्त करने के आवेग । अनुकूल कर्म फल ना मिलने की दशा में क्रोध के आवेग । संचित धन के छिन जाने के भय का आवेग । यह समस्त आवेग मस्तिष्क को अशांत करने वाले होते हैं । अशांत मस्तिष्क की कार्य गुणवत्ता प्रश्नवाचक होती है । योगावस्था में कार्य करने का अभ्यास पर्याय होता है शांत मस्तिष्क । सतत अभ्यास प्रदान करता है सतत शांत मस्तिष्क । शांत मस्तिष्क से किये गये कर्म की गुणवत्ता त्रुटि रहित होगी । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥
मस्तिष्क की ऐसी दशा जिसमें सुख, दु:ख, लाभ हाँनि, विजय पराजय सभी में वह अविचलित रहे । शांति का समुंद्र । जिस प्रकार समुंद्र में नदियाँ लगातार जल लाकर गिराती रहती है परंतु उसका जल स्तर अपरिवर्तित रहता है । उसी प्रकार मस्तिष्क की शांति दशा समुंद्र के समान होनी चाहिये कि काम, क्रोध, भय, उद्विग्नता रूपी नदियाँ कितना भी प्रवाह लावें परंतु उसकी शांति का स्तर अप्रभावित रहे । ऐसे मस्तिष्क के नियंत्रण में किये गये कार्य त्रुटियों से मुक्त होंगे ।

योग के अभ्यास द्वारा सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी शांत मस्तिष्क । चिर आनंद की दशा का भोग करना है तो बनाना होगा मस्तिष्क की शांत दशा । मस्तिष्क की शांत दशा पाने के लिये समस्त कर्मों को योग की अवस्था में करने का अभ्यास करना ही एकमात्र उपाय है । कर्मों की कर्ता प्रकृति है । हम प्रकृति के एक सूक्ष्म घटक हैं । प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों को करना हमारा कर्तव्य है । कार्य के परिणाम से कंचिद मेरा कोई सरोकार नहीं है । मस्तिष्क में इन सत्यों को धारण कर कार्य करने के अभ्यास द्वारा मिलेगी शांत मस्तिष्क की दशा । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें