मनुष्य की शरीर की रचना । शरीर की रचना
में प्रकृति का विज्ञान । शरीर के अंगों के नियंत्रण की क्षमता मस्तिष्क में निहित
। मस्तिष्क में व्याप्त विचारों का कार्य की गुणवत्ता पर प्रभाव । इन सभी को
विस्तार पूर्वक बताने के उपरांत योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एक निचोड स्थिति बताते हुये
कहते हैं कि –
जो व्यक्ति प्रकृतीय गुणों के प्रति मोंह
को त्याग कर सभी प्रकार की इच्छाओं को नियंत्रित करके शरीर को यंत्रवत कार्य में
संलग्न करता हैं उसके कर्म में कोई त्रुटि नहीं होती । शरीर की उत्पत्ति कार्य
करने के निमित्त से ही हुई है । परंतु कार्य के फल के साथ जो मस्तिष्क में व्याप्त
मोंह है वही कर्म दोष उत्पन्न करने वाला होता है । जो व्यक्ति इस सत्य को जानकर और
मस्तिष्क की इच्छा व मोंह को त्याग कर कार्य करता है उसके कर्म में दोष नहीं होता
।
निराशीर्यत्चित्तात्मा
त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥
शरीर को कार्य करने के लिये एक यंत्र के
स्वरूप में जो भी व्यक्ति प्रयोग कर सकेगा उस व्यक्ति के कार्य में कोई त्रुटि
नहीं होगी ।
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