इस कर्म प्रधान
संसार में कर्म की गुणवत्ता ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण एकाकी अवयव है जिसके आधार पर
जीवन की सफलता निर्भर होती है । सफलता दोनों ही विचारों से । भौतिक जगत में
प्रचलित इच्छाओं पर आधारित मानको के मूल्याँकन से भी । आध्यात्मिक विचारों पर
आधारित मूल्याँकन से भी । इसलिये त्रुटि विहीन कर्म का विषेस महत्व होता है ।
आध्यात्मिक विचार की श्रंखला में त्रुटि रहित कर्म शांति प्रदान करेगा । लौकिक जगत
में प्रचलित इच्छाजनित कर्मों के त्रुटि रहित होने पर अधिक भौतिक उपलब्धियाँ सुलभ कराने
वाला होगा । यद्यपि कि ये भौतिक उपलब्धियाँ अशांति प्रशस्थ करने वाली होंगी परंतु
इच्छाओं की पुष्टि होने से कर्ता की इच्छाओं की तुष्टि मिलेगी । आध्यात्मिक पक्ष
पर अपनी चर्चा को केंद्रित रखते हुये, त्रुटि जैसा कि पूर्व के अंकों में उल्लेख किया गया था, इच्छा की पूर्ति में किया जाने वाले कर्म को
त्रुटिपूर्ण कहा गया । उचित कर्म क्या है – प्रकृति की अपेक्षानुसार कर्म । प्रकृति ने ही जन्म दिया
है । इस जन्म देने में प्रकृति का मंतब्य यही था कि हम प्रकृति का कार्य करें । इस
अपेक्षा के विरुद्ध स्वयं अपनी इच्छा का कार्य करना तर्क के आधार पर भी गलत
प्रमाणित होता है । कोई कम्पनी अथवा संस्था कोई कार्मिक रखता है तो कार्मिक का सहज़
धर्म होगा कि वह उस कम्पनी अथवा संस्था के संविधान के अनुरूप कार्य करे । यदि
कार्मिक उस कम्पनी अथवा संस्था के संविधान की परवाह ना करे और स्वयँ अपने इच्छा से
कार्य करे तो उसका इस प्रकार किये गये कर्म को वह कम्पनी अथवा संस्था बर्दाश्त
नहीं करेगी । ठीक इसी आधार पर प्रकृति के बंदे यदि प्रकृति के नियमों का उलंघन
करते है तो प्रकृति के कोप के पात्र बनेंगे ही ।
त्रुटिपूर्ण
कर्मों से बचने का एकाकी उपाय है योग की अवस्था में कर्मों को करना । मस्तिष्क की
योग की अवस्था पाने के लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप को धारण करना है । प्रकृति का
कर्ता स्वरूप ग्राह्य होना ही पाप और पुण्य सृजित करने वाले कर्मों से मुक्ति पाना
है । पाप और पुण्य की श्रेणी के कर्मों से मुक्ति ही पर्याय है त्रुटि रहित कर्म ।
कर्मों की त्रुटि का एकाकी कारण होती है इच्छा ।
सात्विक तामसिक
और राजस यह तीन आवरण हैं जिनकी आड में छिपकर बंदा अपनी इच्छा की पूर्ति का कार्य
करता है । यह तीनों वृत्तियाँ बंधनकारी है । मोक्षदायक होता है सन्यास । सन्यास
संसार से नहीं । सन्यास किये जाने वाले कर्म के परिणाम स्वरूप पैदा होने वाले कर्म
के फल से सन्यास । यह सन्यास जननी होती है योगावस्था की । योगावस्था आधार है
त्रुटि रहित कर्म हेतु । उपरोक्तानुसार दो अलग अलग पथ है । सात्विक तामसिक और राजस
के पथ पर चलते इच्छाओं के लोक में यात्रा करते सुख दु:ख के आँचल में जीवन यापन
करें । अथवा सन्यासी बन सुख दु:ख से मुक्त शांत आनंदमय जीवन का भोग करें ।
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