रविवार, 23 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

निराशीर्यतचित्तात्मा    त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वनाप्नोति किल्विषम् ॥
जो मनुष्य अपने मस्तिष्क को इच्छांओं से मुक्त रखते हुये और समस्त इंद्रीय वासनाओं से मुक्त रहते हुये अपने शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सके उसके कर्म में कोई त्रुटि नहीं होगी । यह कथन एक सत्य स्वरूप का निरूपण है । यह स्वरूप योग की अवस्था को पाने का पथ भी है । इसे बताने के बाद योगेश्वर श्री कृष्ण ने आगे बताया
शक्नोतीहैव च: सोढुं  प्राक्शरीर्विमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: ॥
इसी शरीर के रहते जो मनुष्य काम और क्रोध के प्रभाव से मस्तिष्क में उठने वाले आवेग को नियंत्रित कर मुक्त हो सकता है वही सुखी इंसान होगा ।
इसी शरीर के रहते के उल्लेख का अभिप्राय पुनर्जन्म के सिद्धांत को पुष्ट करते हुये तथा धर्मक्षेत्र के विद्वानों में प्रचलित मत जिसके अनुसार कर्म सिद्धि पाने के लिये कई कई जन्मों तक प्रयत्न करना पडता है, का खण्डन करते हुये, योगेश्वर कहते हैं कि इसी वर्तमान जन्म में ही जीवन जीते सुख की स्थिति पायी जा सकती है । इसे पाने के लिये वाँक्षना क्या बतायी ? काम पर विजय करके । इच्छाओं पर विजय द्वारा । क्रोध से मुक्ति पाकर । क्रोध का जन्म ही होता है काम की पूर्ति ना होने की दशा में । इसलिये यदि काम ही नहीं होगा तो क्रोध का उद्भव ही नहीं होगा । इसलिये मूल नियंत्रण काम का ही अपेक्षित होता है । परंतु उपरोक्त कथन में क्रोध का अंकन फिर अलग से क्यों आवश्यक हुआ ? यह प्रयत्नों को विफल बनाने के विचार से हुआ । सही कर्म करने का अभ्यास अर्थात योग की अवस्था में कर्म करने के प्रयत्न में बाधा उत्पन्न होती है काम और क्रोध द्वारा । काम आया मस्तिष्क में परिणामत: योग का प्रयत्न खण्डित हुआ फल होगा क्रोध । एक दशा है काम के अपूर्ण होने से दूसरी दशा है योग का प्रयत्न खण्डित होने से । यद्यपि कि योग का प्रयत्न काम की श्रेणी में नहीं होता फिर भी लक्ष्य के श्रेणी में तो रहता ही है । लक्ष्य खण्डित होने का फल भी क्रोध ही होगा । इसलिये योगेश्वर ने काम और क्रोध दोनों से मुक्त होने की दशा बतायी । 
पुन: विचारनीय है शब्द सुख । दु:ख की स्थिति उत्पन्न होती है मस्तिष्क की अशांति द्वारा । अशांति हो रहा है कुछ और मस्तिष्क चाह रहा है कुछ भिन्न । परिणाम मस्तिष्क की अशांत स्थिति । इसी आधार पर प्रत्येक स्तर पर इच्छाओं को अशांति का मूल बताया गया है । जो हो रहा है । जो प्रकृति कर रही है । तद्नुसार जो प्रकृति की अपेक्षा है उसी तारतम्य में कर्म करने से कोई अशांति जन्म नहीं लेगी । अशांति की अनुपस्थिति ही शांति की उपस्थिति है । प्रकाश और अंधकार दोनों एक साथ नहीं रहेगे । प्रकाश है तो अंधकार को कोई अस्तित्व सम्भव नहीं । अशांति की अनुपस्थिति ही शांति की उपस्थिति है।

प्रश्न उपस्थित होता है कि इच्छा का नियंत्रण अथवा शमन । यह पूर्णतया मनुष्य के अपने वश के क्षेत्र का विषय है । यह सत्य है कि आम प्रचलित जीवन में हर प्रत्येक मनुष्य इच्छा के अधीन ही समस्त कर्म कर रहा होता है । परंतु कंचिद यह जीवन जीने का अनिवार्य मार्ग नहीं है । इसलिये इच्छाओं को अंकुश करने, इच्छाओं को नियंत्रित करने, इच्छाओं को शून्य स्थिति तक पहुँचाने की स्थिति कोई भी हासिल कर सकता है परंतु प्रयत्नों द्वारा । क्योंकि आम पद्धति इच्छाओं की पूर्ति की प्रचलित है  

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