प्रकृति के प्रति मोह बंधन है । प्रकृति
से विरक्त मुक्ति है । बंधन से मुक्ति । आत्मा प्रकृतीय गुणों में जो आसक्ति पैदा
कर लेती है । यही उसका बंधन है । बंधन में बँधना ही त्रास है । बंधन में वँधता है
गुणों के सुख भोग की अभिलाषा से है । परंतु मिलता है दुख ही । गुणों में कोई सुख
होता ही नहीं । सुख का भ्रम होता है । जिस प्रकार छाया होती है । छाया का कोई
अस्तित्व नहीं होता । मात्र भ्रम होती है । भ्रम की अनुभूति । ठीक वही स्वरूप होता
है प्रकृतीय गुणों का । इनका कोई स्वरूप नहीं होता । मात्र अनुभूति होते है
प्रकृतीय गुण । इनमें सुख की कामना । मात्र भ्रम है । यही सुख का भ्रम जननी होती
है दु:ख की । जब सुख उस प्रकृतीय गुण का स्वरूप ही नहीं तो मिलेगा कहाँ से । नहीं
मिलने पर निराशा ही दु:ख के रूप में प्रगट होगी । छाया का पीछा करने का परिणाम
निराशा के अतिरिक्त दूसरा कुछ अन्य सम्भव ही नहीं ।
जो आत्मा प्रकृति के भ्रामक गुणों के
स्वरूप से बची रहेगी वह निश्चय ही दु:खों से मुक्त रहेगी । यह संसार प्रकृति के
मोहक स्वरूप का विस्तार है । प्रकृति के मोहक स्वरूप में आसक्ति ही बंधन है । दु:खो
को निमंत्रित करना है । प्रकृति के मोहिनी स्वरूप में ही जीवन जीना है । परंतु शांत
सुखद जीवन यापन सम्भव होगा केवल प्रकृतीय मोह से मुक्त रहने की दशा में ही । यह
सत्य जो स्वीकारेगा जिसके जीवन का स्वरूप प्रकृतीय मोह से मुक्त होगा वही ब्रम्ह
की दिव्य चिर आनंद की स्थिति का भोक्ता होगा ।
प्रकृति हमारी जननी है । प्रकृति हमारी
माँ है । उसकी करुणा पाना कल्याण है । उसके भोग की कामना जघन्य अपराध है । अपराध
का फल दण्ड ही होता है । प्रकृतीय मोह से विरक्त जीवन कहा जाता है । निरंजन जीवन ।
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