बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

मनुष्य शरीर में इंद्रियाँ तथा मस्तिष्क सभी कर्म करने के लिये उद्यत होते है परंतु जब तक आत्मा इनके प्रयत्नों को सफल बनाने के लिये सम्मलित नहीं होती तब तक कोई कर्म सम्भव नहीं होता है । प्रत्येक इंद्रिय को कार्य में प्रवृत्त होने के लिये निमित्त अलग अलग होते है । मस्तिष्क को कार्य में प्रवृत्त होने के लिये निमित्त भिन्न होता है । परंतु उपरोक्त समस्त भिन्नता के रहते एक उभयनिष्ठ सत्य आत्मा का सम्मलित होना प्रत्येक में विद्यमान रहता है । इस प्रकार सद्वृत्तियों में और दुर्वृत्तियों में आत्मा सम्मलित होती है । आत्मा के इसी भागीदारी के कारण विवेक का विषेस महत्व हो जाता है । विवेक वह मानसिक क्षमता होती है जिससे उचित अनुचित का भेद प्रगट होता है । उचित को अपनाया जाय और अनुचित को त्यागा जाय । यह मस्तिष्क का क्षेत्र है । इसीलिये कर्म के विचार में मस्तिष्क का विषेस महत्व होता है । प्रकृति के प्रति मोंह आत्मा का सहज़ बंधन होता है । इस मोंह से उबरना विवेक के बल से सम्भव होता है । मोंह और विरक्ति यह दो परस्पर विलोम वृत्तियाँ है । मोंह बंधन है । विरक्ति मुक्ति है । विरक्ति संसार से नहीं । विरक्ति आसक्ति से चाहिये । सुंदर व्यंजन यदि प्रकृति आपको सुलभ कराती है अवश्य भोग करिये । परंतु उस सुंदर व्यंजन को पुन: भोग की इच्छा मस्तिष्क में ना धारण करिये । यही इच्छा बंधनकारी होती है । सुंदर व्यंजन मिला परंतु पुन: मिले यह कामना ही बंधन है । यह बंधन जब मस्तिष्क अपना लेगा तो दूसरा भोग उपलब्ध होने पर भी उसका स्वाद संतोष प्रदान नहीं कर सकेगा क्योंकि उस व्यंजन के स्वाद की इच्छा बाधा के रूप में उपस्थित है । जो इस व्यंजन के स्वाद के मोंह को त्यागेगा वह संतोष के सुख का आनंद पायेगा । यह एक रस्साकशी है । इसका स्थल होता है मस्तिष्क । जो है जो नहीं है के बीच । जो व्यक्ति जो है उसमें संतुष्ट रहेगा उसे जो नहीं है का कष्ट नहीं सतायेगा । जो व्यक्ति उसकी कामना करेगा जो नहीं है उसे जो है उसका सुख भी नहीं मिलेगा । योग की अवस्था आपको प्रदान करती है वह निधि जिसके प्रभाव से आप जो है उसमें संतुष्ट रहने के अभ्यासी बनते है । जो नहीं है का संताप योगी को नहीं सताता है । योगी इच्छाओं के बंधन से मुक्त होता है । इसलिये दु:ख की क्षाया योगी के समीप नहीं रहती । इच्छाओं का नियंत्रण दु:खों का नियंत्रण है । जब तक मोंह का साथ रहेगा तब तक सुख एक कल्पना रहेगी । जिस पल मोंह को त्याग देंगे सुख शांति आपकी धरोहर बन जावेगी ।  

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