मस्तिष्क को योग की अवस्था में स्थापित
करके कार्यों का अभ्यास करना । संसार में जितने भी कर्म हो रहे हैं उनकी कर्ता
प्रकृति है । उपरोक्त दोनो ही कथन एक ही सत्य को दो अलग स्वरूपों में प्रस्तुत
करते हैं । इस सत्य को मस्तिष्क में ग्रहण करना ही जीवन की सार्थकता है । समस्त दु:खों
से मुक्ति पाना है ।
जहाँ एक ओर विद्वान महात्माओं नें
उपरोक्त सुझाव दिया जीवन के उत्थान के उद्देष्य से । वहीं दूसरी ओर उपरोक्त कथन के
विलोम को वर्जित भी बताया । उपरोक्त का विलोम है – विधि विपरीत – प्रकृति की व्यवस्था के विपरीत – इसे वर्जित बताया । जो भी प्रकृतीय व्यवस्था के प्राविधान
है उनके विपरीत कार्य करने में कर्ता व्यक्ति को समस्त विपरीत परिस्थितियों को
सामना करना होगा । विपरीत परिणामों का भुक्तभोगी होना पडेगा । यह प्रयत्न उसी
प्रकार का होगा जिस प्रकार नदी के प्रवाह की दिशा के विपरीत दिशा में तैरने की
चेष्टा करने में अनुभव आता है ।
यदि किसी नियम को मात्र क्रियांवन के
अनुरूप बताया जाय यह एक दशा है । परंतु यदि उस नियम के क्रियांवन को बताने के साथ
ही उसके विलोम को वर्जित भी बताया जाय तो निश्चय ही यह अभिव्यक्ति उस नियम के
क्रियांवन को एक अनिवार्य रूप में पालन करने की अपेक्षा को व्यक्त करने के उद्देष्य
से ही किया जाता है । यह व्यक्त करता है कि इस नियम का पालन मात्र औपचारिक संस्तुति
मात्र नहीं है । इस नियम का पालन ना करने की दशा में विपरीत परिणामों को भोगना
होगा ।
प्रकृति अनंत की सीमा तक व्यपक । प्रचण्ड
शक्तिशाली । अद्भुद विज्ञान से युक्त । सक्षम व्यवस्था है । मनुष्य इस प्रकृति का
अति सूक्ष्म अवयव होता है । प्रकृति की अपेक्षानुसार प्रकृति के निर्देशानुसार
कर्म करना ही मनुष्य का शाश्वत कर्तव्य होता है । प्रकृति के निर्देशो के विपरीत
प्रकृति की अपेक्षा के विपरीत कर्म करने में भलाई नहीं होती है । यह कहना योग की
अवस्था में कार्य करने के अभ्यास की संसतुति को और अधिक बलयुक्त संस्तुति के रूप
में प्रस्तुत करने के समान है ।
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