गत अंक की चर्चा
के क्रम में –
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
प्रकृति ने समस्त रचना क्षिति, जल, गगन, पावक, और वायु नामक पाँच घटको के द्वारा की है । इनमें वायु ही
जीवन का आधार होती है समस्त जीव श्रेणी के जीवन का । इस वायु में जीवन पोषण क्षमता
भी है और प्रचण्ड शक्ति भी निहित होती है । वायु की शक्ति को नियंत्रित करने का
सामर्थ्य किसी में नहीं है । ऐसी प्रचण्ड शक्ति पुँज वायु स्वतंत्र रूप से समस्त
सृष्टि में विचरण करती है । परंतु जब प्रश्न विचारणीय होता है प्रकृति की क्षमताओं
का तो पाया जाता है कि प्रकृति ने प्रचण्ड शक्ति युक्त वायु को भी सीमित किया है
आकाश space द्वारा ।
वायु की समस्त क्षमता आकाश की सीमा में ही प्रभावी है । आकाश के परे नहीं । यह
परिचायक है प्रकृति की क्षमता का ।
प्रकृति की उपरोक्त क्षमता को देवी देवता
भी नतमस्तक हो स्वीकारते है । भगवान शंकर कहते हैं – विधि विपरीत भलाई नाही – विधि अर्थात प्रकृति, विपरीत – अर्थात प्रकृति के नियोजन के विपरीत, प्रकृति ने जो भी व्यवस्था प्रचारित की है उसके विपरीत
आचरण करने वाले का भला अंजाम नहीं होगा । योगावस्था में कार्य करने का जो सुझाव है
वह इसी सत्य का क्रिया रूप है । प्रकृति
की अपेक्षा के अनुरूप कार्य । प्रकृति द्वारा आदेशित कार्य ।
शक्तिशाली प्रकृति के नियोजन के
विरुद्धकार्य किसी भी दशा में सफल नहीं हो सकता । प्रकृति कर्ता के मस्तिष्क में
व्याप्त मोंह को काबू कर लेगी और उसे वाध्य होकर प्रकृति के नीयत किये गये कर्म को
करना होगा । इसी सत्य को योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इस प्रकार बताया
स्वभाव्जेन कौंतेय निबद्ध: स्वेन कर्मणा
।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोअपि तत् ॥
मस्तिष्क में व्याप्त मोह के प्रभाव से
हे अर्जुन तुम मेरे कहे से प्रकृति के द्वारा आदेशित कर्म को नही कर रहे हो परंतु
प्रकृति तुम्हारे मस्तिष्क के मोंह को अतिक्रमित कर लेगी और तुम बाध्य होकर अपनी
इच्छा के विपरीत कर्म करोगे ।
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