चार युगों का वर्णन बताया गया है । इन्हे
नाम दिये गये हैं – सतयुग, कलियुग, द्वापर एवं त्रेता । अलग अलग युगों में समाज में वातावरण
भिन्न भिन्न प्रकार से वर्णन किये जाते हैं । भिन्नता तत्कालीन युग में जीवन जी
रहे मनुष्यों के आचरण में होती है । किसी एक युग में स्वार्थ प्रधान वातावरण होता
है । किसी भिन्न युग में परमार्थ प्रधान वातावरण होता है । इस कथन की पुष्टि में
एक दृष्टांत उद्घृत है । एक किसान अपना खेत रेहन करता है । रेहन अर्थात खेत की
जमानत पर ऋण लेता है । रेहन की व्यवस्था में ऋण देने वाला व्यक्ति उस खेत पर
स्वामित्व का अधिकार भोग करता है जब तक उसका ऋण दिया हुआ धन वापस ना मिल जाय । अत:
ऋण देने वाला उस खेत पर कृषि करता हैं और उपज पाता है । ऋण देने वाला व्यक्ति जब
खेत की जोताई कर रहा होता है उसे एक सोने का टुकडा मिलता है । यह बात उस किसान को
पता चलती है जिसने खेत रेहन किया था । दोनों ही प्राप्त हुये सोने के टुकडे को
अपना अधिकार बताते हैं । एक खेत का मालिक होने के आधार पर और दूसरा काश्तकार होने
के आधार पर । यह एक युग था । एक भिन्न युग में यही घटना होती है । दोनों ही उस
सोने के टुकडे पर दूसरे का अधिकार कहते हैं । काश्त करने वाला कहता है कि खेत के
मालिक हम तो हैं नहीं इसलिये इस सोने को पाने का अधिकार खेत के मालिक व्यक्ति का
है । खेत का मालिक कहता है कि हम इतने दिनों से इस खेत के मालिक थे इसपर काश्त
करते थे मुझे तो मिला नहीं । मिला तो तुम्हारे काश्त करने के काल में तो यह पाना
तुम्हारा अधिकार है । उपरोक्त दोनों भिन्न दृष्टिकोण भिन्न युग के प्रभाव को
व्यक्त करते हैं । समाज में आम वातावरण भिन्न हो जाता है । एक युग में यह आम
वातावरण होता है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में अन्य व्यक्ति के
लिये सद्भाव का विचार रहता है । ऐसे समाज में प्रत्येक मनुष्य का जीवन आम तौर पर
शांतिपूर्ण पाया जावेगा । इसके विपरीत जिस युग में आम वातावरण स्व के वर्चस्व का
होगा उस युग में जीवन जी रहे प्रत्येक मनुष्य का जीवन उद्विग्न अवस्था में होगा ।
यह युगो का भेद मनुष्य के सामर्थ्य के परे का होता है । यह प्रकृति की महिमा का
स्वरूप होता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें