कर्म प्रधान संसार में किये जाने वाले
कर्म का चुनाव सर्वाधिक महत्व का होता है । योगावस्था में कर्म करने का परामर्श भी
प्रभावी योगदान करने वाला प्रमाणित होता है जब उसे सही कर्म के लिये प्रयोग किया
जाय । सही कर्म वह जो प्रकृति की अपेक्षानुसार होवे । यदि कर्म कर्ता व्यक्ति की
इच्छाओं की पूर्ति के निमित्त से होगा तो वह सही कर्म नहीं होगा । सही कर्म का
चुनाव अति महत्वपूर्ण होता है । योग की अवस्था में कार्य करने के लिये प्रयत्नशील
व्यक्ति के लिये प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य का चयन अति संवेदनशील विषय होता है
। योग की सफलता इस पर लम्बित होती है ।
योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं –
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज
।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥
सर्वधर्मान्परित्यज्य - धर्म प्रशस्थ करता
है आचरण । आचरण व्यक्त करता है समस्त किये जाने वाले कर्म । किये जाने वाले कर्मों
का चयन करने के लिये जो भी निर्देश धर्म दर्शन द्वारा प्रतिपादित किये गये । उन
समस्त निर्देशों का पालन यदि अपने विवेक बल से करना सम्भव नहीं हो रहा हो तो -
मामेकं शरणं ब्रज – तुम मेरी शरण में आ जावो । शरण में आने का आवाह्न व्यक्त
करता है कि शरणागत हो जावो । मेरे प्रति समर्पित हो जावो । मेरी कृपा पर आश्रित हो
जावो । ऐसा करने से क्या फल होगा ? मैं तुम्हे समस्त पाप और पुण्य सृजित करने वाले कर्मों से
मुक्त कर दूँगा । पाप और पुण्य सृजित करने वाले कर्म होते है जो इच्छाओं की पूर्ति
की कामना से किये जाते हैं । कार्यों को करने के लिये कार्य का चयन करने में ही
मूल भूल होती है । इच्छा की पूर्ति के लिये किये जाने वाले कर्म को योगावस्था में
किया ही नहीं जा सकता । इसलिये योग की अवस्था में कार्य करने के लिये कार्य का सही
चयन सर्वाधिक महत्व का होता है । इसी कार्यों के चयन को सहीं बनाने के लिये
योगेश्वर ने कहा कि मेरी शरण में आ जावो फिर तुम वही कार्य करोगे जो किया जाना
प्रकृति द्वारा अपेक्षित होगा । इसका फल क्या होगा ? तुम पाप और पुण्य सृजित करने वाले इच्छाजनित कर्मों को
करने से मुक्ति पा जावोगे
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