शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इस व्यापक विस्तृत प्रकृति का स्वरूप मोहक गुणों से भरपूर है । यदि आत्मा अनियंत्रित स्थिति में इस मोहक प्रकृति के संसर्ग में रहेगी तो इसके गुणों में आसक्ति ही सामान्य फल के रूप में प्रगट होगा । इस सामान्य मोह में आसक्ति के परिणाम से बचना है तो सज्ञान पूर्वक संयमित आचरण रखना होगा । जीवन यापन को अल्हडपन में न व्यवहृत कर सज्ञानपूर्वक नियंत्रित आचरण बरतना होगा । प्रकृति मोह का निमित्त है । मोह के लिये किसी को बाध्य नहीं करती । मोहित होना यह दुर्बल आत्मा का आचरण होता है । कर्म पथ से कर्म दोषों को सुधारने का पथ होता है सज्ञानपूर्वक कर्मों को करने का पथ । कर्म करते हुये ही कर्म दोष भी उत्पन्न होते हैं । कर्म करते हुये ही कर्म त्रुटि का निवारण भी होता है । अंतर मात्र सज्ञानपूर्वक करने के अभ्यास में निहित होता है । कर्म दोष को जानते हुये कर्म दोष के निमित्त से सतर्क रहते हुये कर्म किये जाने की दशा में कर्म की गुणवत्ता का सुधार होता है । कर्म दोष से अनभिज्ञ रहते कर्म दोष के निमित्त से लापरवाही बरतते कर्म करने की दशा में त्रुटिपूर्ण कर्मों की वृद्धि होती है । कर्म प्रधान संसार में कर्म ही उत्थान भी प्रशस्थ करता है और कर्म ही पतन भी प्रशस्थ करता है । कर्म करने की परिस्थितियाँ एक समान रहने की दशा में भी भिन्न भिन्न व्यक्ति के कर्मों की गुणवत्ता भिन्न स्तर की होती है । अंतर प्रकृतीय गुणों में आसक्ति से उत्पन्न होता है । यह ऐसी व्याधि है जो किसी को बर्जित नहीं करती । सभी को एक समान क्षति पहुँचाती है । परंतु इसके बावज़ूद भी प्रकृति किसी को मोहित होने के लिये बाध्य नहीं करती । आसक्त और विरक्त साथ साथ रहते हैं । एक ही कक्षा में अनेकों क्षात्र रहते हैं । एक शीर्शस्थ परिणाम पाता है । उसी कक्षा में एक अनउत्तीर्ण भी होता है । सब कर्मों का अंतर है । कर्म की गुणवत्ता आधार है । प्रकृतीय गुणों में आसक्ति कर्म की गुणवत्ता की क्षति करने वाली होती है । परंतु प्रकृतीय गुणों में आसक्त होना बाध्यता नहीं होती । प्रकृतीय गुणों के भोग की लिप्सा आम आचरण है । प्रकृतीय गुणों की आसक्ति से अपने को मुक्त रखते उत्तम गुणवत्तायुक्त कर्म करने का पथ उत्तम श्रेणी के मनुष्य अपनाते हैं । प्रकृति मोह का निमित्त है । प्रकृति में मोंह बाध्यता नहीं है । समस्त कर्मों को मस्तिष्क को योग की अवस्था में रखते हुये करने वाला व्यक्ति उत्तम गुणवत्तायुक्त कर्मों को करते दिव्य शांति की अनुभूति में जीवन जीता है । 

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