मनुष्य की शरीर एक प्रकृतीय रचना है । इस शरीर को बनाने का प्रकृति का
निमित्त कर्म होता है । कर्म की कर्ता प्रकृति होती है । परंतु यह एक अद्भुद
विडम्बना होती है कि प्रकृति कर्म की कर्ता होने के बावज़ूद भी कर्म करने में समर्थ
नहीं होती है । प्रकृति की इस अक्षमता की पूर्ति के लिये आत्मा को ब्रम्ह ने प्रदान
किया प्रकृति को । आत्मा जो कि ब्रम्ह का ही अंश होता है । प्रकृति निर्मित शरीर
में कर्म सम्पादन के लिये दस इंद्रियों के अतिरिक्त मस्तिष्क बनाया है प्रकृति ने
। मस्तिष्क ही नियंत्रक होता है समस्त दस इंद्रियों का । मस्तिष्क ही संचालक होता
है समस्त गतिविधियों का । प्रकृति निर्मित मस्तिष्क व्याधियों से ग्रसित होने की
दशा में कर्म दोषपूर्ण होने लगते हैं । इन दोषों को निवारण के लिये तथा मस्तिष्क
को ग्रसित करने वाली व्याधि के निदान के लिये शोध कर निकाला गया मंत्र योग । योग
में क्षमता होती है मस्तिष्क की व्याधि के निदान की । योग सक्षम होता है कर्म दोष के निवारण के लिये भी । इस प्रकार योग
एक ऐसी औषधि है एक ऐसी प्रणाली है जो निदान भी है सुधार भी है । योग में आत्म
अंवेषण की क्षमता भी है । योग पथ्य भी है । समस्त प्रकृतीय प्रदूषण की एकाकी निवारण
व नियंत्रण विधा योग । योग से अज्ञान स्वरूप अंधकार का निवारण होता है । योग ज्ञान
का प्रकाश भी है । योग की मस्तिष्क की अवस्था में कार्य का अभ्यास जीवन का उत्थान
है । योग की दशा में कार्य का अभ्यास जीवन में आनंद का पथ है । योग की अवस्था में
कार्य का अभ्यास जीवन में शांति का पथ है ।
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