मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

गत अंक से क्रमश:-
सर्वधर्मान्परित्यज्य   मामेकं   शरणं  ब्रज  ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥ 
शरणं ब्रज: - शरण में समाहित होना । शरण संरक्षण के आवरण में । संरक्षण उन समस्त कुप्रवित्तियों से जिनके प्रभाव से हम कर्म दोष को प्रवित्त होते हैं । कुप्रवित्तियों पर विजय सज्ञान पूर्वक नियंत्रित आचरण द्वारा भी पाया जा सकता है । कंचिद यदि कोई ऐसा अपने स्वयं के प्रयत्नों द्वारा नहीं पाने में समर्थ होता है तो ऐसी दशा के लिये योगेश्वर ने कहा कि शरणं ब्रज: । मेरी शरण में आ जावो । अपने को मेरे ऊपर समर्पित कर दो । मेरी कृपा के द्वारा अपनी कुप्रवित्तियों से मुक्ति पावो । इस विचार स्थल पर यह विषेस महत्वपूर्ण है स्मरण रखना कि कुप्रवित्तियाँ पैदा होने का निमित्त भी प्रकृति ही होती है । इनका निवारण भी प्रकृति के द्वारा ही सम्भव होगा । प्रकृति ही जननी है । प्रकृति ही पोषित भी करती है । प्रकृति ही प्रेरणा भी है । प्रकृति ही प्रवृत्ति भी है । प्रकृति ही संहार भी करती है । प्रकृति के प्रति शरणं ब्रज: । प्रकृति के शरण में समर्पित होने का परामर्ष । समर्पण अपने को शून्य स्वरूप में पर्णित करना । अपने को शून्य करने की दशा में जो कुछ भी बचेगा वह प्रकृति ही होगी 

सच्चे रूप में प्रकृति के स्वरूप को जानना । सच्चे रूप में अपने अस्तित्व को पहचानना यह दोनो ही आवश्यक है समर्पण के लिये । ब्रम्ह ने अपने को प्रकृति के रूप में प्रगट किया है । समस्त विस्तार प्रकृति है । क्षिति पृथवी, वह आधार जिस पर समस्त संसार टिका हुआ है, जल जीवन में संचरित होने वाला रस, स्वाद, जीवन शक्ति के संचार का माध्यम, गगन आकाश, दूरी space , हाथ एक है, उँगलिया पाँच क्यो हैं, क्योंकि हाँथ के उस भाग में बीच में space  कर दिया है प्रकृति ने, पावक अग्नि, ऊर्जा का व्यवहारिक जीवन में प्रगट स्वरूप, समीर ‌ वायु, जीवन का आधार, शरीर में प्राण का आधार । यह पाँच मूल अवयव का प्रयोग कर प्रकृति ने इस संसार का निर्माण किया है । इस प्रकृतीय रचना संसार में ही जीवन जीना है । जीने के लिये जो शरीर मिली है वह भी प्रकृति निर्मित ही है । उपरोक्त पाँच मूल अवयवों से ही यह शरीर भी बनी है । प्रत्येक पाँच मूल अवयव भी उन्ही पाँच मूल अवयवों से ही बने हैं । इस प्रकृतीय ब्यूह में प्रकृति के कृपा के सहारे ही जीवन सुगम हो सकता है । इसलिये कहा योगेश्वर ने कि शरणं ब्रज: । शरणं ब्रज: का फल क्या होगा । अप वही कर्म करोगे जो आपसे अपेक्षित होगा । कर्म दोष से मुक्त हो जावोगे ।  

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