गत अंक से क्रमश:-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं
ब्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ॥
शरणं ब्रज: - शरण में समाहित होना । शरण – संरक्षण के आवरण में । संरक्षण उन समस्त कुप्रवित्तियों से
जिनके प्रभाव से हम कर्म दोष को प्रवित्त होते हैं । कुप्रवित्तियों पर विजय
सज्ञान पूर्वक नियंत्रित आचरण द्वारा भी पाया जा सकता है । कंचिद यदि कोई ऐसा अपने
स्वयं के प्रयत्नों द्वारा नहीं पाने में समर्थ होता है तो ऐसी दशा के लिये
योगेश्वर ने कहा कि शरणं ब्रज: । मेरी शरण में आ जावो । अपने को मेरे ऊपर समर्पित
कर दो । मेरी कृपा के द्वारा अपनी कुप्रवित्तियों से मुक्ति पावो । इस विचार स्थल
पर यह विषेस महत्वपूर्ण है स्मरण रखना कि कुप्रवित्तियाँ पैदा होने का निमित्त भी
प्रकृति ही होती है । इनका निवारण भी प्रकृति के द्वारा ही सम्भव होगा । प्रकृति
ही जननी है । प्रकृति ही पोषित भी करती है । प्रकृति ही प्रेरणा भी है । प्रकृति
ही प्रवृत्ति भी है । प्रकृति ही संहार भी करती है । प्रकृति के प्रति – शरणं ब्रज: । प्रकृति के शरण में समर्पित होने का परामर्ष
। समर्पण – अपने को
शून्य स्वरूप में पर्णित करना । अपने को शून्य करने की दशा में जो कुछ भी बचेगा वह
प्रकृति ही होगी
सच्चे रूप में प्रकृति के स्वरूप को
जानना । सच्चे रूप में अपने अस्तित्व को पहचानना यह दोनो ही आवश्यक है समर्पण के
लिये । ब्रम्ह ने अपने को प्रकृति के रूप में प्रगट किया है । समस्त विस्तार
प्रकृति है । क्षिति – पृथवी, वह आधार
जिस पर समस्त संसार टिका हुआ है, जल – जीवन में
संचरित होने वाला रस, स्वाद, जीवन
शक्ति के संचार का माध्यम, गगन – आकाश, दूरी space
, हाथ एक है, उँगलिया पाँच क्यो हैं, क्योंकि हाँथ के उस भाग में बीच में space कर दिया है प्रकृति ने, पावक – अग्नि, ऊर्जा का व्यवहारिक जीवन में
प्रगट स्वरूप, समीर वायु, जीवन का आधार, शरीर में प्राण का आधार । यह पाँच मूल अवयव का प्रयोग
कर प्रकृति ने इस संसार का निर्माण किया है । इस प्रकृतीय रचना संसार में ही जीवन
जीना है । जीने के लिये जो शरीर मिली है वह भी प्रकृति निर्मित ही है । उपरोक्त
पाँच मूल अवयवों से ही यह शरीर भी बनी है । प्रत्येक पाँच मूल अवयव भी उन्ही पाँच
मूल अवयवों से ही बने हैं । इस प्रकृतीय ब्यूह में प्रकृति के कृपा के सहारे ही
जीवन सुगम हो सकता है । इसलिये कहा योगेश्वर ने कि शरणं ब्रज: । शरणं ब्रज: का फल
क्या होगा । अप वही कर्म करोगे जो आपसे अपेक्षित होगा । कर्म दोष से मुक्त हो
जावोगे ।
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