गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण
                      स्त्वमस्य विश्वस्य परँ निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परँ च धाम
                          त्वया  ततँ  विश्वमनंतरूप ॥
  
वायुर्वमोअग्निर्वरूण:   शशान्क
                           प्रजापतिस्त्वं  प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेअस्तु सहस्त्रकृत्व: -  
                          पुनश्च भूयोअपि नमो नम्स्ते ॥
विशाल विस्तृत प्रकृति ही समस्त रूपों की जननी है । समस्त सृष्टि की उद्गम श्रोत है । समस्त नियंत्रण प्रकृति के अधीन हैं । प्रकृति ही समस्त क्रियाँओं की कर्ता है । इसकी कार्य शैली और कार्य करने का विज्ञान इतना अद्भुद है कि कोई भी इसके नियंत्रण का उलंघन नहीं कर सकता है । जो मनुष्य इस प्रकृति के कर्ता रूप को मस्तिष्क में धारण कर कार्य को प्रकृति की सेवा के रूप में करता है वही कर्मयोगी है । कर्मयोगी को कार्य के परिणाम से कोई सम्बंध नहीं रह जाता है ।
प्रकृति ही समस्त संसार में विस्तरित स्वरूपों का उद्गम श्रोत है । प्रकृति ही समस्त स्वरूपों का पालन श्रोत है । प्रकृति ही समस्त रूपों का संहार श्रोत भी है । सभी स्वरूप प्रकृति में ही विलीन भी हो जाते हैं ।
कार्य के परिणाम से मोह रखते कार्य करने की प्रवृत्ति को त्याग कार्यों की कर्ता प्रकृति है और प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य प्रकृति की सेवा के भाव से करना ही मोह से मुक्ति है ।
जो मनुष्य कार्य को परिणाम की आकाँक्षा से करने की अपेक्षा कार्य को आत्मा की मोह से मुक्ति की कामना से करता है वही दिव्य शांति की स्थिति को पाता है ।

अनुभवी महात्माओं का मत है कि कर्म का सही स्वरूप कर्मयोग का अभ्यास हो जाने पर भी उसे प्रकृति की कृपा की वंदना करते ही रहना चाहिये । इस कथन का आधार यह है कि प्रयत्न काल में पथ से विचलित करने वाली प्रवृत्तियाँ सतत कार्य करती रहती हैं । इसलिये प्रयत्नों की सार्थकता के लिये प्रकृति की कृपा की वंदना करते ही रहना चाहिये । प्रकृति की कृपा सहायक ही होगी । 

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