मस्तिष्क की योग की अवस्था । इसे पाने के
लिये प्रकृति के कर्ता स्वरूप को जानना । योगावस्था में कार्य का अभ्यास करने के
लिये प्रकृति द्वारा आरोपित व अपेक्षित कार्य का चुनाव करना । यह एक पक्ष था ।
प्रकृति की अपेक्षानुसार कार्य के विज्ञान की अपेक्षानुसार कुशलता पूर्वक कार्य
करना । फलत: शांत दु:खरहित जीवन पाना ।
दूसरा पक्ष भी होता है । यदि कंचिद
प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य कोई मनुष्य किसी मोह के कारण नहीं करना चाहता तो
ऐसी दशा में प्रकृति उसे बाध्य कर उस कार्य को करा लेगी । इस कथन का अभिप्राय यह
है कि सक्षम प्रकृति उस व्यक्ति के मोंह के निमित्त पर विजय कर लेगी और उस व्यक्ति
के सम्मुख ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करेगी कि वह बाध्य होकर उस कार्य को करेगा ।
इस सत्य को अलग अलग विद्वानों ने अलग अलग ढंग से ब्यक्त किया है । परंतु सभी
विद्वानों की भिन्न अभिव्यक्तियों में जो एक उभयनिष्ठ बात कही गयी है उसके अनुसार
सक्षमप्रकृति ने जो भी कार्यजिस रूप में नीयत किया है उसे वह उसी रूप में करायेगी
ही करायेगी । इसे सहज़ अनुभव करने के लिये कोई भी व्यक्ति अपने ही जीवन में अपने ही
कार्यों में अनुभव कर सकता है । कितनी स्थितियाँ ऐसी आती हैं कि व्यक्ति जिन
विचारों का विरोधी रहता है वह स्वयँ किसी समय विशेस पर वहीं कार्य करते देखा जाता
है । कंचिद उसके विचार नहीं बदल जाते । कोई परिस्थिति ऐसी उत्पन्न हो जाती है कि
वह परवशता की स्थिति में उसे करता है । प्रकृति प्रचण्ड शक्ति की धारक है ।
प्रकृति का कार्य करने का विज्ञान अद्भुद है । वह अपने नीयत कार्यों को करा ही
लेगी । कोई व्यक्ति कोई समुदाय कोई शासन प्रकृति की इस क्षमता को विजय नहीं कर
सकता । चुनाव प्रत्येकका अधिकार है ।
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