मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

कर्म की उत्पत्ति प्रकृति और पुरुष के परस्पर क्रिया द्वारा । परस्पर क्रिया के सम्बंध में ब्रम्ह की अपेक्षा । अपेक्षा के विरुद्ध परस्पर क्रिया के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाला त्रुटि पूर्ण कर्म । इन त्रुटिपूर्ण कर्मों के सुधार के लिये उपाय । उपाय के रूप में कर्म पथ । कर्म करने की विधा द्वारा कर्म की त्रुटि का सुधार । कर्म पथ का आधार यंत्र योग । योग की अवस्था प्राप्त करने का उपाय । इन समस्त चर्चाओं को विगत अंकों में अंकित किया गया । अब इन समस्त विस्तार को सारांश करने के प्रयत्न में- 
कर्म में त्रुटि की उत्पत्ति होती है कर्ता आत्मा की प्रकृति के गुणों में तथा प्रकृति के घटको का स्वामित्व की कामना के कारण । आत्मा प्रकृति द्वारा जाना नहीं जा सकता । फिर भी प्रकृति जो कि नित्य कर्ता होती है को आत्मा की सहायता प्राप्त कर कार्य करने होते है । इस उपलब्धि के लिये प्रकृति जो कुछ भी यत्न कर सकती है वह अपने ही निर्मित मस्तिष्क के माध्यम से ही सम्भव हो सकता है । इन कारणों से योग में जो कुछ भी उपलब्धि है वह मस्तिष्क के ही विकसित कर्म सम्पादन क्षमता द्वारा ही सम्भव होती है । संयमित नियंत्रित मस्तिष्क । मस्तिष्क जिसमें अपने पूर्वाग्रह ना हो । मस्तिष्क जो कि प्रकृति के आदेशों को ग्रहण करने के लिये पूर्ण रूप से सदैव खुला रहे । मस्तिष्क जो कि प्रकृति के आदेशों को यथा अपेक्षा सम्पादित करने के लिये निष्ठा से युक्त हो । मस्तिष्क जिसमें प्रकृति के स्वरूप की स्वच्छ छवि हो । ऐसा मस्तिष्क जो कर्म सम्पादित करेगा उस कर्म की`गुणवत्ता उत्कृष्ठ होगी । कहने के लिये सुधार मस्तिष्क का हुआ । परंतु वास्तविकता में सुधार आत्मा का हुआ । यह है योग का निहित विज्ञान । यह विलक्षण उपलब्धि योग द्वारा ही सम्भव हो सकती है ।
जो मनुष्य अपने कर्म के परिणाम की चिंता ना कर आत्मा के सुधार के लिये प्रयत्नशील होता है वही एक समय ब्रम्ह की चिर दिव्य शांति आनंद को पाता है । आत्मा ब्रम्ह का अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । आत्मा को प्रकृति से निर्लिप्त होना सहज़ अपेक्षा होती है । परंतु प्रकृतीय मोंह में लिप्त आत्मा आम सहज़ विद्यमान स्वरूप है । यही भेद समझने का विषय है । इस भेद को समझ सही अपेक्षित स्वरूप पाना योग्य प्रयत्न होगा ।
प्रकृति के मध्य आत्मा स्थापित है । वह रहेगा सदैव प्रकृति में ही । रहना एक दशा है । उसमें लिप्त होना दूसरी दशा है । रहने की मनाही नहीं है । मनाही लिप्त होने की है ।

जो सर्वस्व त्यागता है । वह पाता है ज्ञान । मोंह को त्यागना है । प्रकृति को नहीं । ज्ञान पाना ही शांति पाना है । शांति ही आनंद है । जो प्रकृति के कर्ता स्वरूप को जान सकेगा वही ज्ञानी कहायेगा । जो आत्मा मात्र प्रकृति के आदेशों को कर्म में रूपांतित करेगा वही ब्रम्ह का सही आदर्श प्रतिनिधित्व करेगा । श्रीकृष्ण श्रीराम ब्रम्ह के प्रतीक थे । उनके कर्मों की गुणवत्ता त्रुटि रहित थी । उनकी आत्मा प्रकृति के आदेशों की यथा आदेश क्रिया रूप में रूपांतरित करने वाली थी । 

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