शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

इच्छा की पूर्ति में किये जाने वाले कार्य के परिणाम के प्रति मोह होना एक स्वाभाविक प्रतिफल होता है । इसके विपरीत प्रकृति द्वारा अपेक्षित कार्य को करने की दशा में कर्ता के मस्तिष्क में कार्य के परिणाम के प्रति सन्यास भाव स्वाभाविक क्रम होता है । कार्य के परिणाम से मोह बंधन है । कार्य के परिणाम से सन्यास मुक्ति है । बंधन जन्म देता है दु:खों को । मुक्ति जन्म देती है शांति को । जो मनुष्य मुक्त रहते जीवन जीयेगा वह दु:खो की काली छाया से मुक्त होगा । दिव्य शांति का आनंद कार्य परिणाम से सन्यास से मिलेगा । दु:ख और कलह मिलता है कार्य के परिणाम से मोह करके ।
योगावस्था में कार्य करना मुक्ति दिलायेगा । मुक्ति इच्छाओं से । मुक्ति वासनाओं से । प्रकृति के प्रति मोह से । आसक्त आत्मा त्रुटि पूर्ण कर्म करायेगी । त्रुटिपूर्ण कर्म पैदा करेंगे जीवन में अशांति । कार्य वही होंगे । कार्य करने के समय मस्तिष्क की यथास्थिति के अनुसार अंतर पैदा होता है । यदि कार्य काल में कार्य के परिणाम से मोंह विद्यमान रहेगा मस्तिष्क में तो अशांति के पथ पर यात्रा होगी । यदि कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम के प्रति सन्यास विराजमान रहेगा तो यात्रा शांति के लिये होगी । कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम से मोंह की स्थिति अथवा सन्यास की स्थिति का होना निर्भर करेगा कार्य के चयन पर, कार्य करने के कारण पर, कार्य के प्रति भाव पर । यदि कार्य किसी इच्छा की पूर्ति में किया जा रहा है तो कार्य के परिणाम से मोंह अवश्य रहेगा, कार्य करने का कारण इच्छा की पूर्ति होगी, कार्य काल में मस्तिष्क में कर्तापन का भाव रहेगा । यदि कार्य प्रकृति द्वारा प्रेरित है तो कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के परिणाम से कोई मोंह नहीं रहेगा, कार्य करने का निमित्त कार्य ही होगा, कार्य काल में मस्तिष्क में सेवा भाव रहेगा ।
कार्य करने के लिये ही जन्म हुआ है । कार्य के चयन और कार्य के निमित्त तथा कार्य काल में मस्तिष्क में कार्य के प्रति भाव को नियंत्रित रखने से शांति और आनंद की स्थिति मिलेगी । गलत कार्य चयन तथा कार्य के परिणाम से मोंह तथा कार्य के प्रति मस्तिष्क में कर्तापन का भाव दु:ख और अशांति उत्पन्न करेगा । इस सत्य को जो जानेगा । इस सत्य को अपने कार्य में जो चरितार्थ करेगा । वही आनंदित जीवन का भोग करेगा ।

संसार की समस्त परिस्थितियाँ एक ही रहेंगी । मात्र मस्तिष्क की उपरोक्तानुसार भिन्न स्थितियाँ सुख और दु:ख की दो परस्पर विपरीत स्थितियाँ उत्पन्न करेंगी । कार्य वही रहेंगे । मात्र उसे करने के काल में मस्तिष्क में विद्यमान कार्य के परिणाम के प्रति मोंह अथवा सन्यास की दो भिन्न  स्थितियों से कर्ता व्यक्ति हासिल करेगा दु:ख या आनंद । 

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