गत दिवस के लेख के क्रम में –
निराशीर्यत्चित्तात्मा
त्यक्तसर्वपरिग्रह: ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ॥
शरीर को प्रकृति ने बनाया है कर्म करने
के लिये । कर्म की प्रेरणा प्रकृति से ही ग्रहण करना अपेक्षित होता है । व्यवहारिक
जगत में प्रचलित रूप में कर्म की प्रेरणा इच्छा से ग्रहण करने का अभ्यास प्रत्येक
मनुष्य का है । उपरोक्त श्लोक में इसी प्रचलित भ्रांति के निवारण की बात कही गयी
है । इच्छाओं का जन्म होता है आसक्ति से । इसीलिये कहा कि सभी इंद्रियों की आसक्ति
को त्याग कर । इस त्याग की उपलब्धि क्या होगी ? इस शरीर में कर्म करने के लिये जो भी प्रकृति के आदेश
आयेगें शरीर उन्हे आदेश की अपेक्षानुसार करेगी । मस्तिष्क में इच्छाओं की उपस्थिति
से प्रकृति के प्राप्त आदेश को यथाआदेश कर्म करने की प्रवृत्ति क्षीण होती है । इसी
स्थिति को अधिक स्पष्ट करने के लिये श्लोक के उत्तरार्ध में कहा कि शरीर को एक
कर्म करने के यंत्र के रूप में प्रयुक्त किया जाय । जिस प्रकार यंत्र एक निश्चित
विधि से कार्य करता है उसी प्रकार शरीर भी कर्म करे । यंत्र को चलाने वाला कौन है
इस बात से उसके कर्म में अंतर नहीं होता उसी प्रकार शरीर के कार्य में भी होना
चाहिये । प्रकृति कर्ता है । यदि उसके आदेश को शरीर उसी रूप में कर्म में पर्णित
कर रही है तो यथा अपेक्षा है । यदि प्रकृति के आदेशों में इच्छा को मिश्रित किया
गया तो त्रुटि है ।
उपरोक्त अपेक्षा यंत्र की उच्च efficiency की कार्य गुणवत्ता को प्राप्त करने के उद्देष्य से है
। efficiency शब्द विज्ञान में किसी यंत्र में input और output
के अनुपात को व्यक्त करने के लिये किया जाता है
। उपरोक्त श्लोक में जो अपेक्षा व्यक्त की गई है वह ठीक यही है कि प्रकृति का आदेश
जिस भी स्वरूप में input होवे उसी रूप में बिना किसी विकृति के शरीर उसका
कर्म output प्रगट करे । 100% efficiency | यद्यपि की
विज्ञान निर्मित कोई यंत्र 100% efficiency
का नहीं होता है । परंतु यह शरीर प्रकृति
निर्मित यंत्र है और यदि योगावस्था में कार्य किये जाँय तो 100% efficiency मिलती है ।
उपरोक्त कथन का
और अधिक स्पष्ट स्वरूप अनुभव करने के लिये पारा का दृष्टांत प्रस्तुत है । पारा को
किसी भी पात्र में रखा जाय और बाद में उसे उस पात्र में से निकाल दिया जाय । जितना
पारा उस पात्र में रखा गया था वह पूरा पूरा वापस मिल जावेगा । पारा ना ही उस पात्र
जिसमें उसे रखा गया था का कुछ लेकर वापस आयेगा और ना ही अपना कुछ भाग उस पात्र में
छोडकर आयेगा । इसी पारे के चरित्र के अनुसार जो शरीर प्रकृति के आदेशों का अनुसरण
करेगी वही सही आचरण होगा । प्रकृति के आदेशों का यथाआदेश पालन उसमें इच्छाओं का
आरोपण रंचमात्र भी नहीं । ऐसा एक ही दशा में सम्भव होगा जब व्यक्ति इंद्रियों की
भोग आसक्ति से मुक्त होगा ।
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