प्रकृति का
दायित्व है कर्म करना । कर्ता है ब्रम्ह का अंश आत्मा । इसलिये प्रकृति यदि कंचिद
आत्मा को प्रेरित ना कर सकी तो कर्म सम्भव नहीं होगा । प्रकृति आत्मा को कर्म में
संलग्नकरने के लिये एक तरफ अपने गुणों का प्रयोग करती है तो दूसरी ओर आत्मा की
आसक्ति का लाभ उठाते हुये उसे कार्य में संलग्न करने का पथ अपनाती है । इन्ही
सत्यों के आधार पर भारतीय धर्म दर्शन में समस्त आचरण सम्बंधित पथ निर्दिष्ट किये
गये हैं । आत्मा को ब्रम्ह ने प्रकृति के मध्य रखा ही इसीलिये है कि वह प्रकृति के
कार्य दायित्व को पूरा करावे । इसलिये बिना अलग से उल्लेख किये यह अनिवार्य
वाँक्षना होती है आत्मा के कर्तब्य की कि वह प्रकृति द्वारा निर्देशित कार्यों को
ही करे । यह अत्यंत विचित्र स्थिति होती है कि प्रकृति आत्मा को अपने गुणों के
सहारे ही कार्य में संलग्न भी करती है और यही गुणों में आसक्ति ही आत्मा को
प्रकृति के निर्देशों के विपरीत कार्य करने का पथ भी बनता है । इसलिये मनुष्य शरीर
की प्रकृति को अति संयमित और नियंत्रित रखना अत्यधिक महत्वपूर्ण योगदान करने वाला
प्रमाणित होता है । शरीर की संयमित प्रकृति ही आधार बनती है आत्मा के संयमित आचरण
के लिये । शरीर की संयमित प्रकृति का अर्थ है शरीर के प्रत्येक अवयव का नियंत्रित
उपयोग । जिह्वा विशिष्ट स्वाद की कामना प्रेरित ना करे । नाक विशिष्ट गंध की कामना
प्रेरित ना करे । इसी प्रकार अन्य इंद्रियाँ भी । इस स्थिति को पाने के लिये सोना
जगना खाना पीना सभी कुछ संयमित और नियंत्रित करना होगा । जब तक बिना विचारे
व्यसनों में संलग्न रहेगा कोई तब तक संयम उसके लिये एक कल्पना मात्र रहेगी ।
संयमित प्रकृति पर्याय है संयमित जीवन शैली का । व्यापक विस्तृत प्रकृति शरीर की
प्रकृति को नियंत्रित करती है । शरीर की प्रकृति का संयम बाह्य प्रकृति के
नियंत्रित प्रभाव का आधार बनेगा । गुणों के भोग की वृत्ति नियंत्रित होगी । यह
सारी उपलब्धि किसी बाह्य श्रोत अथवा शक्ति से सम्भव नहीं होगी । यह उत्थान सदैव
अपने प्रयत्नों से सम्भव होगा ।
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