एक समय स्थल पर दो परस्पर विरोधी
प्रवृत्तियाँ नामत: इच्छाये और इच्छारहित एक दूसरे के प्रभाव को निष्प्रभावी कर
अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिये किसी मनुष्य के मस्तिष्क में युद्ध कर रहीं
होती हैं । यह संघर्ष कुछ काल तक चलता रहता है । पुन: एक समय स्थल आता है जब
उपरोक्त दोनों प्रवृत्तियों में से कोई एक प्रवृत्ति संघर्ष से अलग हो जाती है ।
शांत हो जाती है । इसके विपरीत दूसरी प्रवृत्ति संघर्ष के लिये पूर्ववत तत्पर रहती
है । इस समय स्थल पर जो प्रवृत्ति संघर्ष के लिये तत्पर बनी हुई रहती है उसके
लिये संघर्ष के परिणाम के रूप में कहा
जाता है कि वह विजयी हुई । संघर्ष की प्रवृत्ति का बना रहना ही उसकी विजय होती है
। संघर्ष की प्रवृत्ति का शमन होना ही पराजय है ।
आचरण के उत्थान के प्रसंग में मस्तिष्क
में व्यप्त इच्छायें ही समस्त दु:खद स्थितियों की जननी होती हैं । आचरण समस्त किये
जाने वाले कर्मों की अभिव्यक्ति एक शब्द में आचरण । आचरण का उत्थान कर्म दु:ख पैदा
करने वाले ना हों । ऐसा सम्भव होगा तभी जब कर्म की प्रेरणा इच्छा की पूर्ति के
निमित्त से ना हो । इच्छा पूर्ति के लिये ही कर्म करना एक सामान्य अभ्यास हम
प्रत्येक का सामान्य आचरण बना हुआ है । इसीलिये दु:ख जीवन का सामान्य स्वरूप बना
हुआ है । इसके निवारण के लिये दु:ख के मूल इच्छाओं को समाप्त करना होगा । ऐसा
संकल्प मस्तिष्क में धारण करने की दशा में एक संघर्ष की स्थिति पैदा होगी । अनादि
काल से मस्तिष्क में शासन करती इच्छायें और उत्थान की कामना पर आधारित इच्छारहित
के मध्य संघर्ष होगा । यदि जीवन में व्याप्त कलह को समाप्त करना है तो इच्छारहित
कर्मों की प्रवृत्ति को विजयी बनाना होगा । विजय के लिये इस इच्छारहित कर्म की
प्रवृत्ति को कायम रखना होगा । इच्छारहित कर्म की प्रवृत्ति समाप्त ना होना ही
उसकी विजय होगी ।
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