प्रकृति का
व्यापक विस्तृत स्वरूप जिसमें नियंत्रण क्षमता पालन क्षमता सृजन क्षमता निहित है ।
इस स्वरूप का बोध होने पर एकाकी जीव की सूक्ष्म सीमित क्षमता अपरिहार्य रूप से
ग्राह्य हो जाती है । योगेश्वर श्रीकृष्ण ने प्रिय शिष्य अर्जुन को योग और प्रकृति
के कर्ता स्वरूप को बताया । परंतु अर्जुन को उसका सही रूप समझ में नहीं आया । इस
स्थिति को व्यक्त करते हुये अर्जुन ने योगेश्वर से विनय किया कि कृपया हमें दिब्य
रूप का दर्शन कराइये । योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि दिव्य रूप को
तुम इन आँखों से नही देख सकोगे । इसलिये मैं तुम्हे दिव्य आँखे देता हूँ जिससे तुम
दिव्य रूप को देख सकोगे । दिव्य चक्छु से अर्जुन ने प्रकृति का जो दिव्य रूप देखा
उसका वृतांत कवि ने निम्नवत् व्यक्त किया –
त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण –
स्त्वमस्य विश्वस्य परँ
निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परँ च धाम –
त्वया ततँ
विश्वमनंतरूप ॥
वायुर्वमोअग्निर्वरूण: शशान्क –
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेअस्तु सहस्त्र्कृत्व: -
पुनश्क भूयोअपि नमो
नम्स्ते ॥
अर्जुन ने जो
दिव्यरूप देखा तो उसका वृतांत व्यक्त करते कहता है – आप ही समस्त विष्व का आधार हो, आपही अनंत काल से सर्वभौम शासक हो, आपका ही वर्णन चारो वेदों में किया गया है, समस्त संसार में फैले हुये समस्त रूप आप ही हो प्रभू
।
वायु आपही हो, काल आपही हो, चंद्रमा आपही हो, सृजना कर्ता ब्रम्हा आपही हो, समस्त रूपों के मूल आपही हो, मैं आपके हज़ारों रूपों को बारम्बार प्रणाम करता हूँ
।
वास्तविकता का
ज्ञान होने पर मनुष्य को अपने अस्तित्व की सूक्ष्मता का बोध होता है । और जब यह
अहसास हो जाता है कि प्रकृति कितनी व्यापक है और एकाकी मनुष्य उसके सामने कितना
सूक्ष्म अस्तित्व है तो अहंकार का दमन होता है । प्रकृति के स्वरूप का जब तक बोध
नहीं रहता है तभी तक अहंकार छाया रहता है । मनुष्य को लगता है कि सब कुछ हम ही हैं
। जब कि यह मात्र भ्रांति होती है । सब कुछ प्रकृति ही है । जो कुछ भी हो रहा है
सब प्रकृति ही कर रही है ।
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