गत अंक के क्रम को सतत् रखते हुये –
योगेश्वर श्री कृष्ण ने प्रकृति की
नियंत्रण क्षमता को बताया –
यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि
मत्स्थानीत्युपधारय ॥
पुन: प्रकृति की क्रिया शैली में किस
प्रकार उसमें निहित नियंत्रण क्षमता का प्रयोग सम्भव होता है को बताया –
स्वभावजेन कौंतेय निबद्ध:
स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोअपि तत् ॥
उपरोक्त उद्घृत दृष्टांतों से प्रगट किये
गये योगेश्वर श्रीकृष्ण के विचारों को आत्मसात कर महात्माओं ने यही योग्य निष्कर्श
निकाला कि इस संसार में जीवन जीने के लिये योग्य मत यही है कि प्रकृति की प्रभुता
की कृपा क्षाया में जीवन जीया जाय । किसी भी दशा में प्रकृति की अपेक्षाओं का अथवा
प्रकृति के संचरित व्यवस्था का विरोध करने वाला कोई कृत ना किया जाय । यही सज्ञान
पूर्वक करने के लिये योगावस्था में कार्य करने का पथ सुझाया गया । योगावस्था वह
दशा जिसमें मस्तिष्क पर कार्य के परिणाम से प्रभाव ना पडे । ना ही मस्तिष्क अनुकूल
कार्य परिणाम से हर्षित होवे । ना ही विपरीत कार्य परिणाम से दु:खी होवे ।
योगावस्था जिसमें कार्य ही कार्य को करने का निमित्त होवे । योगावस्था जिसमें
कार्य के परिणाम की अपेक्षा के बगैर कार्य को किया जाय । ऐसा करना प्रकृति के
प्रति निष्ठावान होना है । ऐसा करना प्रकृति के प्रति आज्ञाकारी होना है । जो
व्यक्ति प्रकृति के प्रति निष्ठावान होगा प्रकृति के प्रति आज्ञाकारी होगा प्रकृति
उसके ऊपर कृपालु होगी । उसके कृत पावन होंगे । कार्यों को करते वह दिव्य शांति की
अनुभूति करेगा । चिर दिव्य आनंद की स्थिति का भोग करेगा ।
उपरोक्त के प्रतिकूल यदि प्रकृति की
अपेक्षाओं की उपेक्षा कर स्वयं अपनी इच्छा की पूर्ति के निमित्त कार्य करना
प्रकृति के कोप का पात्र बनना होगा । प्रकृति के कोप को झेलना जीवन को कष्टमय
बनाना होगा । जीवन अशांत होवेगा । भय उद्वेग आक्रोश की स्थितियाँ सदैव सम्मुख
रहेंगी । जीवन कष्टों का पर्याय बन जावेगा ।
कंचिद यदि प्रारम्भ में अपने सज्ञान के
सहारे यह सम्भव ना हो सके कि योगावस्था में कार्य कर सकें तो ऐसी दशा में प्रकृति
की कृपा के लिये प्रकृति की ही वंदना करना योग्य मत होगा । प्रकृति निष्ठावान
व्यक्ति के ऊपर सदैव कृपालु होती है । प्रकृति की कृपा होने की दशा में प्रत्येक
असम्भव प्रयत्न सम्भव साध्य बन जाते हैं ।
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