कर्म की
उत्पत्ति होती है प्रकृति और पुरुष की परस्पर क्रिया द्वारा । कंचिद पुरुष आत्मा
और प्रकृति दोनो ही अपने उत्पत्ति के मौलिक स्वरूप और गुणा धर्म के अनुसार वर्ताव
करें तो सृजित होने वाला कर्म आदर्श स्वरूप में होगा । परंतु विकृत आत्मा और
विकृति प्रकृति एक दूसरे के साथ परस्पर करते हैं तो परिणामत: सृजित होता है दूषित
कर्म । कर्म के दूषित होने के कुप्रभाव से प्रगट होने वाली कुप्रवृत्तियाँ एवँ
प्रदूषण उत्पन्न करता है कलह दुराग्रह वैमनस्य एवँ अन्य अनेक । जब मनुष्य त्रस्त
हो जाता है उपरोक्त कुवृत्तियों से खोजता है निवारण । निवारण के विचार क्रम में
पुरुष आत्मा जो कि प्रकृतीय इंद्रियों की ज्ञान सीमा से परे होता है को सीधे
उपायों द्वारा सुधारना सम्भव नहीं होता । इसलिये इस पुरुष आत्मा के सुधार के प्रयत्न
भी सुलभ प्रकृति के माध्यम से ही करना होता है । शरीर प्रकृति के संयमित नियंत्रित
आचरण द्वारा । इस आचरण में सम्मलित होते हैं समस्त छोटे बडे कर्म । समय से सोना
जगना । समय से सभी शरीर के पोषण के कार्य । समस्त वृत्ति से सम्बंधित कार्य ।
समस्त सामाजिक दायित्व के कार्य । सभी उपरोक्त को अति संयमित व नियंत्रित विधि
द्वारा । इस नियंत्रण के प्रभाव से पुरुष आत्मा अप्रत्यक्ष होते हुये भी प्रभाव को
ग्रहण करता है । यह मूल आधार होता है समस्त सुधारत्मक प्रयत्नों के लिये । यदि
देखा जाय तो विघटन का भी यही आधार होता है । इसलिये चाहे विघटन को सीमित करने का
विचार प्रश्नगत होवे या सुधार का प्रयत्न विचाराधीन होवे दोनों ही परिपेक्ष्य में
नियंत्रण ही उभयनिष्ठ यंत्र होता है । नियंत्रण द्वारा ही उत्थान सम्भव होता है ।
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