योगेश्वर
श्रीकृष्ण ने बताया कि यदि इच्छायें मस्तिष्क में नहीं होवें और मनुष्य मस्तिष्क
को नियंत्रित रख कर शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सके तो
उस मनुष्य के कार्य में कोई त्रुटि नहीं होगी ।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह:
।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वनाप्नोति किल्विषम् ॥
शरीर को यंत्र
के रूप में प्रयोग करना । शरीर द्वारा कर्म करने के लिये इसमें ज्ञानेंद्रिया
सम्मलित हैं । इन ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से प्रकृतीय गुणों का प्रवेष होता है ।
इन प्रकृतीय गुणों में लिप्त हुये बिना इन इंद्रियों को एक कर्म करने के यंत्र के
रूप में प्रयोग करना । इस प्रकार शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में
प्रयोग करना ।
मस्तिष्क के
संचय प्रभाग में किसी इच्छा का कोई भण्डारण ना होवे । आत्मा किसी प्रकृतीय गुण के
भोग की इच्छा ना संजोये होवे । यह दोनों ही स्थितियाँ मस्तिष्क के कार्य संचालन
दक्षता को प्रभावित करती हैं । इसलिये योगेश्वर ने कहा कि इन दोनो से मुक्त
मस्तिष्क । कार्य का समस्त संचालन व नियंत्रण मस्तिष्क से ही होता है । इसलिये
मस्तिष्क की दशा ही सर्वप्रधान महत्वपूर्ण होती है ।
परिग्रह जो
इंद्रियों के प्रकृतीय हुणों के भोग के प्रति आत्मा में आसक्ति सृजित करने वाली
होती हैं से मुक्त आत्मा । इन आसक्तियों का त्याग कर । कर्म संचालन व नियंत्रण
केंद्र मस्तिष्क व्याधियों से विकारों से मुक्त । ऐसा मस्तिष्क शरीर को एक कार्य
करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सकेगा । ऐसे मस्तिष्क द्वारा संचालित कर्म
त्रुटि मुक्त होगा ।
योग की दशा में
कार्य करना । यह भी मस्तिष्क की एक विशिष्ट दशा का ही वृत्तांत बताया गया था ।
मस्तिष्क की योग की दशा पाने के उपाय के रूप में वर्तमान श्लोक में विस्तार बताये
गये । निराशीर्यतचित्तात्मा
त्यक्तसर्वपरिग्रह मस्तिष्क विकारों तथा व्याधियों से मुक्त । ऐसा मस्तिष्क
शरीर को एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग कर सकेगा । इस प्रकार शरीर को
एक कार्य करने के यंत्र के रूप में प्रयोग का परिणाम होगा कि कर्म त्रुटि से मुक्त
होंगे ।
श्रीमद् भागवद्
गीता में ब्रम्ह का ज्ञान तथा उसे पाने का पथ दोनों ही वर्णित है । ब्रम्ह ने अपने
अंश को आत्मा के रूप में हम प्रत्येक में विद्यमान किया है । इस आत्मा की अनुभूति
कर्म करने की विधा के द्वारा करने का उपाय योग । योग की स्थिति पाने का पथ
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह
की मस्तिष्क की स्थिति । आत्मा की अपनी शरीर में उपस्थिति का बोध ही ब्रम्ह को
पाना है । कर्म में त्रुटि प्रगट करती है आत्मा की आसक्ति प्रकृति के गुणों के
प्रति । इन त्रुटियों से मुक्ति शाश्वत आत्मा की उपस्थिति का भान करायेगा । ब्रम्ह
को खोजने कहीं जाना नहीं है । वह हम सभी के अंदर विद्यमान है । उसे पहचानने के
लिये उसपर आच्छादित विकारों और उसे ग्रसित किये व्याधियों को हटाना होगा । विकारों
और व्याधियों से ग्रसित आत्मा त्रुटिपूर्ण कर्मों को प्रगट करती हैं । त्रुटिपूर्ण
कर्म विकारों और व्याधियों को और बढाती हैं । इसलिये शाश्वत आत्मा के दर्शन के
लिये अपने कर्म की त्रुटियों को सुधारना होगा । उपाय उपरोक्त वर्णित पथ द्वारा
सम्भव होगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें