गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

ज्ञान यात्रा

अनुशासित मस्तिष्क द्वारा प्रेरित कार्य की मर्यादा विशिष्ट श्रेणी की होती है । मस्तिष्क जिसमें आचरण के प्रति निष्ठा हो । मस्तिष्क जिसमें संविधान के प्रति आदर भाव हो । मस्तिष्क जिसमें कार्य को कुशलता से करने की भावना हो । यह समस्त भाव मस्तिष्क में जाग्रित होने के दशा में प्रकृति की विस्तृत क्षवि के प्रति मोहयुक्त आसक्ति स्वाभाविक रूप से नियंत्रित हो जाती है । मोह ही जड होती है कर्म दोष उत्पन्न होने के विचार से । इसलिये मोह के नियंत्रित होने से त्रुटियाँ नियंत्रित हो जाती हैं । इसप्रकार समस्त विक्षेपों को अंकुश करने का एक एकाकी स्थल होता है मस्तिष्क को अनुशासित करना । इस उपलब्धि को स्वयँ अपने द्वारा ही सबसे प्रभावी रूप से हासिल किया जा सकता है । जब किसी के अपने मस्तिष्क में यह चेतना जाग्रित हो जाय कि मुझे अपने मस्तिष्क को अति अनुशासित बनाना है तो ही वह सत्यरूप में इसे अनुशासित बना सकेगा । सतत अपने कर्मों का परीक्षण कर यह देखेगा कि हमने क्या सही किया क्या त्रुटिपूर्ण हुआ । इस प्रकार पायी गयी त्रुटि को सुधारने का उपाय करेगा । कर्म जब त्रुटियों से मुक्त हो जावेगे । कर्म गुणवत्ता पूर्ण होने लगेगे । सुधार की प्रक्रिया तेज हो जावेगी ।
व्यापक प्रकृति की विस्तृत क्षवियाँ सदैव से हैं और रहेंगी । आत्म संयम चेष्टा द्वारा जाग्रित होता है । प्रकृति की क्षवियों में मोह आम सामान्य जीवन है । इस मोह से मुक्त होना विषेस प्रयत्न द्वारा सम्भव होता है । जीवन के प्रत्येक कार्य किये जाँय परंतु मोह से बँधे बिना किये जाय । कर्म करना ही कर्म करने का कारण हो । किसी इच्छा की पूर्ति कर्म करने का कारण ना हो । मस्तिष्क अनुशासित रहेगा । जिस पल कर्म करने का कारण किसी इच्छा की पूर्ति के लिये होगा तत्काल ही मस्तिष्क का अनुशासित स्वरूप विध्वंस हो जावेगा । मस्तिष्क अनुशासित नहीं रह जावेगा । तत्काल ही ऐसा मस्तिष्क अनुशासन को त्याग इच्छा की पूर्ति के लिये कोई भी पथ अपनाने को चेष्टारत हो जावेगा ।

प्रकृति की विस्तृत क्षवि से प्रत्येक मनुष्य का मस्तिष्क प्रभावित होता है । परंतु एक व्यक्ति उसी क्षवि को पाने को आतुर हो जाता है । एक दूसरा व्यक्ति अपने संयम द्वारा अपने को उस क्षवि के प्रति आतुर होने से अंकुश करता है । यही विवेक मस्तिष्क को अनुशासित बनाता है । अनुशासित मस्तिष्क ही कर्मों के उत्थान का आधार है । प्रकृति की मोहिनी में जीवन यापन करते हुये उस मोहनी से मोह आसक्ति ना करते हुये अपने कर्म करने वाला ही विशिष्ट उपलब्धियाँ पाता है । समाज में उत्कृष्ट उपलब्धियों को पाये हुये किसी भी व्यक्ति के जीवन और उसके कार्यों का सूक्ष्म अध्ययन करके उपरोक्त कथन की सत्यता परीक्षित की जा सकती है । जितने भी उत्कृष्ट उपलब्धि के लोग हैं उनमें उपरोक्त अनुशासित मस्तिष्क की स्थिति अवश्य पायी जावेगी । कोई भी देश हो । कोई भी क्षेत्र हो । अनुशासित मस्तिष्क ही समस्त गुणों का आधार है । 

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