रविवार, 16 मार्च 2014

आत्मज्ञान

 कर्म ही बंधनकारी भी हैं । कर्म ही मोक्षदायक भी हैं । कर्म किये कैसे जाते हैं । कर्म करने की प्रेरणा कहाँ से ग्रहण की जाती है । कर्म करने का निमित्त क्या है । निर्धारित करते हैं कि वह कर्म बंधनकारी होगा कि मोक्षदायक होगा । योग की अवस्था में कर्म करना अभ्यास करना है मुक्ति का । इस प्रकृतीय मोंह से मुक्ति । मन की इच्छाओं की पूर्ति में कर्म करने से मुक्ति । दु:खों से मुक्ति । शांति की प्राप्ति के लिये । आनंद का सुख पाने के लिये । संसार कर्म द्वारा ही है । संसार में जन्म कर्म करने के लिये ही है । प्रकृति की विस्तृत क्षवि में मोंह ग्रसित होकर वासनाओं की पूर्ति के भ्रम में कर्म करना बंधनकारी पथ है और प्रकृति की अपेक्षानुसार प्रकृति के कर्ता स्वरूप की मर्यादानुसार प्रकृति की सेवा भाव से कर्म मोक्षदायक है मुक्ति का पथ है ।

आदि महात्मा शंकर नें तो योगावस्था में कर्म करना आत्मज्ञान होना कहा है । आत्मा को प्रकृति के मध्य प्रकृति के प्रयोजनों की पूर्ति के लिये ही रखा है । भ्रमवश आत्मा प्रकृतीय मोंह में बँध जाता है । उसे इस मोंह से मुक्ति दिलाना हम प्रत्येक का धर्म है । इस धर्म के निर्वाह के लिये योग योग्य पथ है । योग की अवस्था में कार्य करना आत्मज्ञान है ।  

1 टिप्पणी:

  1. आत्मा का ज्ञान आत्मज्ञानी सदगुरु के व्दारा ही हमें मिल सकता है.हमें इस चौरंसी फेरे घूमकर जो मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है उसका मुख्य उद्देश क्या है ये सिर्फ आत्मदर्शी सद्गुरुही हमें समजा सकते है.इसलिए
    हमारे आत्मा मालिक सदगुरु देव अपनी अमृतवाणी से हर जिव को सन्देश देते है|

    आत्मा जगत का सर्वोत्तम सत्य है| जगत में सभी वस्तुओंका अंत होता है|सृष्टि में असंख बदलाव होंगे ,परन्तु आत्मा अमर है क्योंकि इसका अदि और अंत दोनों नहीं है|अनादी कालसे आत्मतत्व चला आ रहा है और अनंत काल तक यह चलता रहेगा क्योंकि आत्मा अमर और अमिट है|
    सभी देवताओं की उत्पति पूर्व आत्मा का अस्तित्व था,इसी कारन हमें आत्मा की पूजा करनी चाहिए |आत्मा से प्रेम करना चाहिए|पलभर का आत्मचिंतन ही सर्व श्रेष्ठ है |आत्मा की पूजा सभी देवातओंकी पूजा है |
    प्रभु प्राप्ति का सरल मार्ग आत्मचिन्तन है |क्योकि आत्मा ही परमात्मा है और व हर-एक के ह्रदय में विराजमान है|केवल बाहरी रूप को न देखकर अन्तरीय रूप को यानि आत्म-स्व-रूप को देखिये एवंम प्रभु प्राप्ति कीजिए|
    आत्मा निर्गुण निराकार है जिसे देखने के लिए सगुन साकार रूप की आवश्यकता होती है |और वह सगुन साकार रूप और कोई नहीं सद्गुरु है होता है |आत्मचिंतन से ही सदगुरु का ध्यान किया जा सकता है|आत्मा की कोई जात,समुदाय,धर्म नहीं होता है|हिन्दू,मुस्लिम,सिख, इसाईं सभी आत्म ध्यान द्वारा प्रभु प्राप्ति कर सकते है |यशु ख्रिस्त,गुरुनानक,मोहम्मद पैगंबर,भगवान श्रीकृष्ण ,भगवान महावीर,भगवान गौतम बुद्ध इन्होने भी आत्मा की पहचान ध्यान अभ्यास,आत्मचिंतन व्दारा प्रभु की प्राप्ति की|
    आत्मा मालिक
    आत्मा मालिक ध्यानपीठ कोकमठान तहसील कोपरगाव जिल्हा अहमदनगर महाराष्ट्र
    संपर्क ७३०४०४६६००,८६६९६००६००,७५८८६९४०७७

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